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17 10 2013 GYDS SHIVSANDESH OMSHANTI


Post Thu Oct 17, 2013 9:33 am

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बाप बैठ बच्चों को राजयोग सिखलाते है .. इस राजयोग से राजाओं का राजा बनते हो ... तुम वारियर्स हो .. जानते है हम आत्मायें अब बाप के साथ योग रखने से भारत को पवित्र बनाते है और चक्र के आदि मध्य अंत की नोलेज धारण कर हम चक्रवर्ती राजा बन रहे है .. हम युद्ध के मैदान में है ... अब इस भारत को फिर से दैवी डबल सिरताज राजस्थान बना रहे है, श्रीमत पर श्री श्री शिवबाबा है, उनकी माला बनती है .. सारी माला है रूद्र शिवबाबा की .. तुमको चक्रवर्ती राजा रानी बनना है तो बुद्धि में चक्र फिरना चाहिए ना.. परमपिता परमात्मा का नाम, रूप, देश, काल कोई भी नही जानते , जब तक की बाप आकर अपना परिचय दे और परिचय भी बहुत गम्भीर है .... सब आत्मा एक्टर्स है .. अपने अपने समय पर आकर और फिर चले जाते है .. फिर हरेक को अपना पार्ट रिपीट करना होता है .. सेकेण्ड बाय सेकण्ड ड्रामा हुबहू रिपीट होता है .. बाप समझाते है – हे आत्मा, अपने मन बुद्धि से प्रभात के समय मुझ बाप को याद करो .. मुझ और यह चक्र को जानने से तुम चक्रवर्ती राजा बनते हो ज्ञान के चित्र बहुत वेल्युबुल है ... हरेक बच्चे के पास यह चित्र जरुर होने चाहिए .. साथ में अच्छे अच्छे गीत भी हो .. यह है अवीनाशी ज्ञान रत्नों का खजाना .. तुम दानी हो, तुम्हारे जैसा अविनाशी ज्ञान रत्नों का दान कोई कर नही सकता ... यह चित्र मोस्ट वेल्युबुल चीज है, अमूल्य है .. भारत सम्पूर्ण निर्विकारी गोरा था .. संगम पर ही बाप आकर स्थापना करते है राजयोग सिखलाते है ... जब दुर्गति पूरी होगी तब तो बाप सद्गति करें आयेंगे ना .. पीस सथापन करें तुम बाप के मददगार हो .. पुरुषार्थ महेनत कर सूर्यवंशी राजधानी की प्राइज मिलेगी .. बाप श्रीमत देने वाला है ... स्टूडेंट को राय दी जाती है की बाप को याद करो तो तुम्हारे विकर्म विनाश होंगे .. योगबल से ही तुम्हारी आत्मा पवित्र बनेगी .. तुम सब सितायें हो, आग से पार होती हो .. या योगबल से पार होना है .. देह सहित सब सबंधों को त्याग एक मोस्ट बिलवेड बाप को याद करना है .. भारत का प्राचीन योग और ज्ञान मशहूर है क्यूंकि गीता है सर्व शास्त्रमइ शिरोमणी , सब आत्मायें परमधाम में निवास करें वाली है फिर शरीर धारण कर पार्ट बजाती है .. बाबा इनमे आकर शिक्षा दे रहे है ... यह चक्र भारत के लिए ही है .. भारतवासी ही चक्र लगाते है ... इन चित्रों पर बड़ा अटेंशन रहना चाहिए .. सर्विस करके दिखाओं ..

मेरे बाबा कह रहम स्नेह रूहानी दृष्टि की प्राप्त करें वाली समर्थि सम्पन्न आत्मा ... बाप का प्यारा और प्रिय रूहानी मीठा सिकिलधा बच्चा .. पवित्र पावन पूज्य सूर्यवंशी देवता ..
ज्ञान :- श्री श्री रूद्र त्रिमूर्ति शिवबाबा, पतित पावन, बागवान, मोस्ट बिलवेड बाबा की बड़े ते बड़ी कोलेज में बाप से राजयोग की शिक्षा लेने वाला ... बाप के समीप समुख साथ बैठ पढ़ने वाला गोडली स्टूडेंट .. बाप की श्रीमत पर चल पूरा मददगार बन सूर्यवंशी राजधानी माना पीस, प्योरिटी प्रास्परिटी की प्राइज लेने वाला रूहानी वोरियार्स ... योग :- निरंतर याद, योगअग्नि, योगबल, याद की आग, से पार होने वाली सच्ची सीता .. बाप हाथ और साथ वाली आत्मा एक्टर .. प्रभात के समय मन बुद्धि द्वरा बाप को याद करें वाला ... एक बाप की याद वाला सर्वस्व त्यागी आत्मा ... धारणा :- स्वचिन्तन स्वउन्नति में समय सफल करें वाला .. बाप की श्रीमत वा राय शिक्षा पर चलने वाला बाप का अमूल्य हिरा जैसा लायक बच्चा .. नशे वाला खुशहाल .. रावण पर विजयी रूहानी वोरियर्स .. सतयुगी राजधानी का .. ८४ जन्म वाला .. सूर्यवंशी कुल का .. पवित्र पावन पूज्य चक्रवर्ती राजा ... सेवा :- योगबल से आत्माओं को पावन बनाने वाला ... अविनाशी ज्ञान रत्नों का दानी .. सर्व को हीरे जैसा बनाने वाला .. चक्र के आदि मध्य अन्त की नोलेज वाला .. चित्रों पर अटेंशन रख सर्विस करने वाला .. एग्जीविशन से सर्विस .. बड़े चित्र पर सर्विस .. बड़े अक्षर में सर्विस .. विहंग मार्ग की सर्विस .. भारत को दैवी राजस्थान बनाने वाला ... सर्विस करके दिखाने वाला सर्विसएबुल बच्चा .. ज्वालापॉइंट :- योगअग्नि वाली सर्वस्व त्यागी ज्वाला ... शिवसन्देश :- श्रीमत पर बाप का पूरा मददगार बन सूर्यवंशी राजधानी माना पिस प्योरिटी प्रास्परिटी की प्राइज़ लेनी है .. सबंध :- परमपिता परमात्मा मातपिता बापदादा बन्धुसखा साथीस्वामी मालिकखुदादोस्त बालकवारिस बापटीचरसतगुरु को याद प्यार नमस्ते और गुड मोर्निग गुड नाईट बाबा ... सर्व सबंध से सर्व स्मुर्तीस्वरूप ... ज्ञान योग धारणा सेवा श्रीमत बैलंस वाला समान सम्पन सम्पूर्ण फरिश्ता ... सुक्रिया बाबा सुक्रिया .. आप का अक्षोनी टाइम सुक्रिया ... मेरे बाबा प्यारे बाबा मीठे बाबा ... मैं आत्मा और मेरा बाबा ही संसार है ... दुसरा ना कोई .. मैं भी बिंदी .. बाप भी बिंदी .. ड्रामा भी बिंदी ... आत्मास्वरूप देवतास्वरूप पूज्यस्वरूप ब्राहमणस्वरूप फरिश्तास्वरूप संतुष्टस्वरूप निर्विघ्नस्वरूप सिद्धिस्वरूप प्राप्तिस्वरूप स्मुर्तीस्वरूप

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