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THE SERMONISER OF THE GITA – an invitation to know



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समाधान होकर सोचने से हमें ये सच प्राप्त होते हैं-


१)भगवान हर युग में अवतरित हो नहीं सकता। हर कल्प के अन्त में ही अवतरित हो सकता है:


भगवान हर युग में आ नहीं सकता। क्योंकि अगर वह हर युग में आकर फिर से धर्म का स्थापन करता है तो हम नीचे उतर ही नहीं सकते थे। हमेशा सतयुग ही रहना चाहिए था। क्योंकि अगर वह सतयुग के अन्त में ही अवतरित होता तो उसका कर्तव्य बनता है कि फिर से सतयुग का ही स्थापन करे। जैसे अगर कोई बेटरी (battery) जब थोडा सा ही कम होने पर तुरन्त ही रीचार्ज अर्थात भराया जाता है तो फिर वह सम्पूर्ण खाली हो ही नहीं सकता। अर्थात हम त्रेतायुग तक भी आ नहीं सकते थे। कलियुग को तो पहुंचने की तो फिर बात ही नहीं। शास्त्रों में कहा गया है- सतयुग के आदि में धर्म को ४ पाँव थे (अर्थात धर्म १००% था), त्रेतायुग के आदि में ३ पांव (अर्थात ७५%), द्वापर के आदि में २ पांव (५०%), कलियुग के आदि में सिर्फ़ १ पांव (२५%) रहता है। कलियुग के अन्त में धर्म पूरा बिगड जाता है। तो कलियुग का अन्त ही धर्मग्लानि का समय है न। वही भगवान का अवतरण का समय हो सकता है न।
भगवान को पतितपावन कहा जाता है।अर्थात जब भगवान अवतरित होता है, तो सम्पूर्ण दुनिया पावन होना चाहिए। तो सिद्ध है कि सबसे भ्रष्ठ कलियुग के अन्त में ही भगवान को आना पडे।



भगवान को कहा जाता है- सर्व के सद‌गतिदाता। अर्थात उसके आने का समय है जब सभी (= सर्व) दुर्गति में हो। आज के कलियुग के अन्त का समय वही है। क्योंकि आज सभी दुर्गति में है। साधु सन्त जो श्रेष्ठ माने जाते हैं, वे भी सरकार के कानून के अन्दर हैं। देश का पालन करनेवाले नेतायें भी वोट के भिकारी है। बच्चों और स्त्रियों में भी गुण नहीं है। सभी चिन्तित हैं। भगावान के मन्दिरों को भी पुलीस की रक्षा चाहिये। राजा में हुक्म चलाने की ताकत रहती है। लेकिन आजकल के मन्त्रियों में वह ताकत नहीं है। उनकी कुर्सियां हिलती रहती हैं। पहले की साधु सन्त जंगलों में निर्भय होकर सादा जीवन व्यतीत करते थे। वैरागी थे। लेकिन आजकल उनमें वह शक्ति नहीं है। तो कलियुग का अन्त ही धर्मग्लानी का समय है। तो वही परमात्मा के अवतरण का समय है।
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२)हम अभी गीता के श्लोकों से सत्य को डूंढने का प्रयास करें।

अ)अव्यक्तं व्यक्ति मापन्नं मन्यन्ते माम बुद्धयः
परम भाव मजानन्तो, ममाव्यय मनुत्तमम --- (७-१४)
"बुद्धिहीन लोग मेरे परम भाव को न जानने कारण मैं जो अव्यक्त हूं, मैं व्यक्त में आया- ऐसे समझते हैं"। [अर्थात जो समझते हैं कि भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, मछली, कछुवा, सुवर, इत्यादि व्यक्त रूप में प्रकट हुवा- वे बुद्धिहीन हैं।]

यह स्लोक बताता है कि भगवान अव्यक्त है। वह कभी भी व्यक्त आंखों से दिखाई देनेवाला नहीं है। श्रीकृष्ण तो मां के गर्भ से पैदा हुवा व्यक्त रूप ही है। तो वह कैसे यह स्लोक बोल सकता है?


आ)"कविं पुराणमनु है। है। है। है। है। " - (०८-०९, ०८-१०)
"सर्वज्ञ है, अनादि है, अणु से भी सूक्षम है, तमो से बहुत दूर है,......। यहाँ गीता का भगवान अपने को अणु से भी सूक्ष्म कहा है। क्या श्रीकृष्ण का रूप अणु से भी सूक्ष्म है? [अणु से भी सूक्ष्म अर्थात बिन्दु रूप है। तो हमें ध्यान में उस अणु रूप अर्थात बिन्दु को ही याद करना है- ऐसे स्पष्ट होता है न।]


इ)द्वाविमौ पुरुशौ लोके क्षराश्चाक्शर ए वच
क्शरः सर्वाणि भूतानी कूटस्थोक्शर उच्यते---- (१५-१६)

"इस दुनिया में विनाशी और अविनाशी- ऐसे दो रीति के पुरुष हैं। उनमें समस्त जीवियों के शरीर विनाश होने वाले हैं और जीवात्मा अविनाशी है।"

उत्तम पुरुषस्त्वन्यः परमात्मे त्यु दा हॄतः
यो लोकत्रय मा विश्य बिभर्तय्व ईश्वरः -(१५-१७)


"इन दोनों रीति के पुरुषों से उत्तम पुरुष तीस्रा है। वह तीनों लोक प्रवेश होकर सभी की रक्षा और पालन करता है। वह अविनाशी ईश्वर को परमात्मा कहा गया है।"

इनसे स्पष्ट हैं- कुल मिलाकर तीन चीज़ें है। जीव, जीवात्मा/यें, और परमात्मा। १)जीव अर्थात जीवकोश या जीव कण - इनसे बनाया गया शरीर या देह। २)जीवात्मा अर्थात हर जीव(देह = शरीर) में जो आत्मा निवास करती है वह अर्थात आत्मा। वह आत्मा शरीर/जीव के माध्यम द्वारा कर्म करती है। इसलिए जीवात्मा कहलाती है। ३)जीव/शरीर से परे आत्मा अर्थात कर्म बन्धन से परे आत्मा अर्थात अशरीरी परमात्मा है। तो सिद्ध है कि हर आत्मा को अपना अपना जीव है। लेकिन परमात्मा को अपना जीव/शरीर नहीं है। तभी तो वह सर्व आत्मावों से भी श्रेष्ठ परमत्मा (= परम आत्मा) कहलाता है। [थोडा सोचिए- श्रीकृष्ण को तो अपना जीव/शरीर है ही। तो फिर वह जीवात्मा ही हो सकता है। परमात्मा कैसे हो सकता है?]


ई)महाभारत के उद्योग पर्व में यह श्लोक है।

एष नारायणः कृष्णः फाल्गुनश्च नरः स्मृतः।
नारायणो नरश्चैव सत्वमेकं द्विधा कृतम।
"श्रीकृष्ण साक्षात नारायाण है और अर्जुन नर है। ये नर और नारायण एक ही अस्तित्व वाले के प्रकट हुए दो रूप हैं।"
इससे सत्युग के पूज्य देवता श्रीकृष्ण (नारायण) ही कलियुग में अर्जुन (नर) अर्थात मनुष्य बनता है। ऐसे हो जाता है। क्योंकि जब कहा गया है कि इनका अस्तित्व एक ही है तो इन दोनों की आत्मा एक ही हो सकता है। एक आत्मा को एक ही समय में दो देह हो नहीं सकते। तो यह एक ही आत्मा के अलग अलग समय के स्थिति (जन्म) हो सकते हैं।


इससे सतयुग का देवता श्रीकृष्ण जो सुन्दर था वही जन्म मरण चक्र में आने से श्याम (=पतित = अपवित्र) नर (अर्जुन) अर्थात मानव बनता है- ऐसे सिद्ध होता है। इसलिए ही श्रीकृष्ण को श्यामसुन्दर नाम रखा गया होगा। और गीता में अर्जुन को पापिष्ट कहा गया है (०४-३६) है।

उ)आज जो संस्कृत भाशा में जो गीता प्रचलित है, उसमें ७०० श्लोक हैं। लेकिन महभारत में गीता के समाप्ति के बाद उसी पर्व में ४३वी अध्याय के ४वी और ५ वी श्लोकों के अनुसार गीता के श्लोक ७४५ हैं- देखिए-

"षट शतानि सविंशानि श्लॊकानां प्राः केशवः
अर्जुनः सप्तपं चाशत सप्तषष्टिं च संजयः।
धृतराष्ट्रः श्लॊकमॆकं गीताय मानमुच्यतॆ"
इसके अनुसार कृष्ण के ६२० श्लॊक, अर्जुन के ५७ श्लॊक, संजय के ६७ श्लॊक और धृतराष्ट्र के एक श्लॊक'- कुल मिलाकर ७४५ श्लॊक होने चाहिए। लेकिन आज के गीता में सिर्फ़ ७०० श्लॊक हैं। इससे सिद्ध होता है कि- गीता में मनुष्य बाद में भी अपने हाथ डालकर और भी खण्डन किया है।


ऊ)अपि छेदसि पापेभ्यः, सर्वेभयः......(०४-३६)
"हे अर्जुन- तुम सभी पापियों से भी पापी हो, तो भी ज्ञान के नाव से उस सारे समुद्र को पार करोगे।"
अभी सोचने की बात है- क्या महाभारत कथा के अनुसार अर्जुन सभी पापियों से भी पापी या बहुत पापी है? उसने क्या क्या पाप और कब किये? क्या गीता को माननेवाले मानेंगे कि अर्जुन बडा पापी है?


ऋ)बहूनां .....। (०७-१९)"
"बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानवान होकर 'वासुदेव ही सर्वस्व'- ऐसे (भाव से) मुझे पाता है। ऐसे महात्मायें अत्यन्त दुर्लभ हैं।"
क्या गीता को माननेवाले ऐसे समझते हैं कि अर्जुन ने बहुत जन्म लिया है? ज्ञानवान बननेवाले बहुत जन्म लेते हैं- क्या गीता मननेवाले यह मानते हैं?


ये बातें भी यहां सिद्ध होते हैं- १)ज्ञान मिलना कल्प के अन्त में ही है। तो भगवान कल्प के अन्त में ही आता है अर्थात कलियुग के अन्त में ही आता है। उसके पहले युगों में वह आता नहीं। २)जो बहुत जन्म लेते हैं, उन्हें ही भगवान मिलता है। अर्थात जो सतयुग के आदि से ही सृष्टि में हैं, वे ही ज्ञान को समझ सकते हैं। ३)जो पहले ही इस सृष्टि में थे, वे सबसे ज्यादा जन्म लेते होंगे। तो सबसे ज्यादा देह के आकर्षण, बन्धन में वे ही आते होंगे। तो सबसे ज्यादा पतित बने होंगे। इसलिये अर्जुन को सबसे ज्यादा पापि कहा गया है। इसके बारे में थोडा ज्यादा समझाने की प्रयास करते हैं।


ॠ)सत्य नारायण की कथा की महिमा:-
आप देखेंगे कि सत्य नारायण की कथा कि बहुत महिमा, प्रसिद्धि है। तो वह क्या कथा होगी? ज़रूर सत्य युग के नारायण की कथा होगी अर्थात सत्युग के नारायण के पूर्ण कथा होगी न। अब- आत्मा तो मरती नहीं। वह एक शरीर छोड दूसरा लेती है। तो ज़रूर इस सृष्टि के नम्बर वन आत्मा के सम्पूर्ण जीवन कहानी अर्थात उसके अनेक जन्म मरण कहानी ही सत्य नारायण की कथा होगी न। गीता में यह भी कहा गया है- "हे आर्जुन- तुम अपने पिछले जन्मों को नहीं जानते हो। मैं जानता हूं।" ज़रा सोचिए- आत्मा का ज्ञान होना माना उस आत्मा के एक जन्म की कहानी नहीं। बल्की उसके आदी से अन्त तक के जन्मों को जानना है।


सिर्फ़ एक जन्म को जानना तो आधा ज्ञान हो गया। आधा ज्ञान को अपायकारी (half knowledge is dangerous) बताया गया है। तो सत्य नारायण की कथा अर्थात उस आत्मा के पूरे जन्म मरण की कहानी।

विशेष लोगों के जन्म कहानी को लोग पढते हैं। पढने के कारण हैं- या तो उन जैसे बनने के लिये या उनसे कुछ अच्छे गुण वा चरित्र सीखने लिये या तो उन्होंने जो चीज़ को अविष्कार (invention) किया है, वह हुनर सीखने के लिये। इसके बिना अगर कोइ किसी के जीवन कहानी पढता है, तो उससे फ़ायदा नहीं होगी। तो सत्य नारायण की कथा (जीवन कहानी) सुनने से भी कोई न कोई फ़ायदा होगी न।


सतयुग में श्री लक्ष्मी और श्री नारायण राज्य करते थे। अकेला नारायण राज्य थोडे ही करते होंगे। उनके साथ प्रजा भी होगी न। सत्य नारायण का राज्य धर्म श्रेष्ठ होगा और कलियुग में धर्म भ्रष्ठ राज्य होगा। भगवान का कर्तव्य धर्म स्थापन करना। तो भगवान को कलियुग के अन्त में आकर फिर से सतयुग अर्थात सत्य नारायण के राज्य को स्थापन करना होगा। तो सत्य नारायण की कथा भगवान ही सुना सकता होगा। क्योंकि जब नारायण ही जन्म मरण चक्र में आकर अपने को भूलता है तो सिर्फ़ एक भगावन जो अजन्म, अयोनिज, निराकार, ज्ञान सागर पतितपावन है, वही अवतरित होकर ज्ञान सुना सकता है न। और किसी में वह ताकत हो नहीं सकता। गीता को राजयोग कहा गया है। तो भगवान सत्य धर्म और राज्य दोनों स्थापन करता है। इसके लिये ही गीता में कहा है कि- "तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो, मैं जानता हूँ।"



अब नारायण और उनके सारी प्रजा सतयुग के आदी से कलियुग के अन्त तक सबसे ज्यादा जन्म मरण चक्र में आते होंगे। तो सबसे ज्यादा जन्म वे ही पाते होंगे। तो सबसे ज्यादा देह के सम्बन्ध में आने के कारण सबसे ज्यादा पाप भी होंगे। इसलिये सबसे ज्यादा पतित होंगे। सबसे ज्यदा जन्म लेने के कारण सबसे ज्यादा भक्ति भी करते होंगे। तो भक्ति का फल ज्ञान भी उन्हें ही ज्यादा प्राप्त होंगे न।


ए)ये प्यन्य देवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः
ते पि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम-- (०९-२३)
"हे अर्जुन, श्रद्धा से अन्य देवतावों की पूजा करनेवाले भी मेरी पूजा करते हैं लेकिन वह विधिपूर्वक नहीं।"
अभी सोचिए- जब श्रीकृष्ण एक देवता (यहां पहले ही बताया है) ही है- तो श्रीकृष्ण ऐसे कह सकेगा? ज़रूर निराकार भगवान ही ऐसे कह सकेगा न।


कईयों का कहना है कि श्रीकृष्ण परमात्मा क अवतरण के रूप है। सूर्य, चान्द, सितारें, अग्नि, वायु, इत्यादि- ये सभी हैं देवता। चलिए ऐसे मानते हैं। तो भी-


यान्ति देवव्रता देवान, पितृन यान्ति पितृव्रतः
भूतानि यान्ति भूतेज्या, यान्ति मध्याजिनोपिमाम। -(९-२५)
"देवतावों में जिन्हें भक्ति हैं वे देवता के पास पहुन्चते हैं। पितृ भक्त पितृ के पास पहुन्चते हैं। भूतों को पूजनेवाले भूतों के पास पहुन्चते हैं। मुझे पूजनेवाले मेरे पास पहुन्चते हैं।"


यहां गीता का भगवान स्पष्ट कहता है- सिर्फ़ एक भगवान की भक्ति सबसे उत्तम है। अन्य देवता, पित्, भूत, इत्यादियों की पूजा करना उतना उत्तम नहीं है। फिर भी आजकल के गीता माननेवाले सिर्फ़ श्रीकृष्ण की पूजा नहीं करते हैं। वे अनेक देवतावों की उपासना भी करते हैं। तो क्या इनको भगवान का परिचय है? क्योंकि अगर भगवान का सत्य परिचय होता तो अन्य देवता की पूजा नहीं करते थे न। तो जो बहुत देवतावों की पूजा करते हैं वे गीता का भगवान को जानते नहीं है- इस नतीजे पर पहुंचना पडता है।


ए)बहुत श्लोकों में हैं- "मैं ईश्वर हूं।":-
देखिए- १५-१७, १०-०३, ०९-११, ११-०३, ११-०४, ११-०९, ११-१६, ११-२५, ११-४४, १०-१५ ।
बहुत जगह बताया है कि "मैं ईश्वर हूं"। तो गीता का भगवान ईश्वर अर्थात शिव ही होगा न। कितना सहज और स्पष्ट लिखा है!


ऐ)यो मामजमनादिं च वेत्ति लोक महेश्वरम
असं मूढः स मर्त्येषु सर्व पापैः प्रमुच्यते। -(१०-०३)
"जो मुझे अजन्म, अनादि, और सभी लोकों के महान ईश्वर हैं- ऐसे समझते हैं वह मनुष्य में ज्ञानी होकर सर्व पापों से मुक्त होता है।"

श्रीकृष्ण तो माँ के गर्भ से ही पैदा हुवा है। तो फिर वह अजन्म, अनादि कैसे हो सकता है?

ओ)अवजानन्ति मां मूढा मानुशीम तनुमाश्रितम
परम भाव मजानन्तो मम भूत महेश्वरम।- (०९-११)
"मैं जो सारे जीवकोटी के महेश्वर हूं, मेरे परम भाव को न जानने मूढ मनुष्य शरीर धारण किया हुवा मुझ परमात्मा को तुच्छ समझते हैं।"


अभी देखिए- महाभारत के अनुसार सभी ने श्रीकृष्ण को अत्यन्त श्रेष्ठ गौरव दिये थे। बहुत से थोडे लोग- जैसे जरासन्ध, शिशुपाल, कन्स जैसे अधर्मी लोगों ने श्रीकृष्ण को गौरव नहीं दिया था। लेकिन उनमें भी बहुतों को श्रीकृष्ण के शक्ति का परिचय था। उन्हें श्रीकृष्ण का भय भी था। इसलिए यह श्लोक श्रीकृष्ण को कैसे लगता है।
[यहाँ ये महत्व पूर्ण विचार स्पष्ट होते हैं- यहां भगवान कहता है कि मैं मनुष्य तन का आधार लेता हूँ। इससे यह सिद्ध होता है कि-


१)श्रीकृष्ण (या कोई भी मनुष्य) का तन तो भगवान का रूप नहीं। भगवान को शरीर ही नहीं। वह निराकार है।
२)भगवान जब अवतरित होता है, तो मनुष्य तन का ही आधार लेता है, न को कोई प्राणी के।

३)तो भगवान मछली, कछुवा, इत्यादी अवतार ले सकता है? तो जो दशावतार माने गये हैं, वह ठीक नहीं है। ऐसे लगता है न। क्योंकि जब कहा गया है कि लोग मनुष्य तन को देख तुच्छ समझते हैं, तो फिर अगर भगवान मछली, इत्यादि रूप में आया तो क्या समझ सकेंगे? लोगों को भगवान का परम भाव समझने में आयेगा?

तो गीता का भगवान कौनसा मानव शरीर लेता है जिसको मनुष्य तुच्छ समझते हैं? वास्तव में भगवान कलियुग में ही आता है धर्म स्थापन करने को। कलियुग में सभी मानव के देह दुर्गन्ध, बीमारी के वश अपवित्र तन है। तो जब कलियुग में भगवान एक मनुष्य के शरीर में प्रवेश होकर ज्ञान देते हैं, तो मनुष्यों को निश्चय पैदा होना कठिण होता है। [परमात्मा के रथ अर्थात उस मनुष्य तन के बारे में अन्त में दिया है]


औ)न तद भासयते सूर्यो न शशांको पावकः
यद गत्वान निवर्तन्ते तद्धाम परमम मम ॥ - (१५- ०६)
"मेरे परम धाम वह है जहां सूर्य, चान्द, अग्नि के प्रकाश नहीं। जिन्हें पाने के बाद फिर से इस दुनिया को वापिस नहीं आते हैं, वह दुनिया मेरा निवास स्थान है"


तो स्पष्ट है कि जिस दुनिया में सूर्य, चान्द के प्रकाश हैं, वह भगवान के देश नहीं। तो फिर भगवान सर्वव्यापी हो नहीं सकता है न। लेकिन गीता माननेवाले लोग तो भगवान को सर्वव्यापी ही मानते हैं।
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Last edited by mbbhat on Mon Nov 04, 2013 3:04 am, edited 1 time in total.
Murli Pt:- Gambheerataa se full marks jamaa hota hai. Mamma toh gambheerataa kee devi thi. = The virtue seriousness gives full marks. Mamma was a deity of seriousness.


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३)देह में आत्मा का स्थान:-


स्पर्शान कृत्वा ...............। -(०५-२७)
"बाहर के विषयों को दूर करके दृष्टि को भृकुटि के बीच में रखो (एकाग्र करो),... "
सर्वस्य धातारम............।
प्रयाण काले मनसा चलेना ...........। -(०८-०९, ०८-१०)

"मरने के समय भक्ति से होकर अचल श्रद्धा से भृकुटि के बीच प्राण को स्थिर करके, सर्वज्ञ, पूर्वज, (विश्व का) नियम बनानेवाला, अणु से भी सूक्षम, सभी के धातु, अचिन्त्य रूपी, आदित्य वर्ण, तमो से बहुत दूर रहनेवाला, (जो परम पुरुष है), उसके स्मरण करनेवाला वह दिव्य परम पुरुष को प्राप्त करता है...........।"

इनसे भी सिद्ध होता है कि आत्मा का स्थान भृकुटि है। मन्दिर में जब जाते हैं, तो भक्त लोग तिलक को भृकुटि के बीच लगाते है"। लेकिन आश्चर्य की बात है कि गीता को माननेवाले या बहुत से भक्त जन आत्मा का स्थान को हृदय (heart) मानते हैं।
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४)गीता है राजयोग:-

गीता को राजयोग कहा जाता है। राजयोग के कई अर्थ:- राजा = सभी से ऊन्च, योग = सम्बन्ध या साधना।
१)राजा बनने के लिये योग (साधना), या २) अन्य सभी योग (साधनावों) के राजा (से ऊंच), या सभी योग के (सम्बन्धों में से) राजा (श्रेष्ठ)

लेकिन गीता पढनेवाले राजा बनने का लक्ष्य ही नहीं रखते हैं। वे तो मोक्ष का लक्ष्य रखते हैं। अगर भगवान की शिक्षा मोक्ष के लिये है तो वह क्यों कहेगा कि मैं इस दुनिया में धर्म स्थापन करता हूँ? यहां का धर्म फिर किसके लिये है?
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५)मोक्ष - सिर्फ़ एक कल्पना है:-

१)भगवान को ही मोक्ष नहीं है। [क्योंकि जब धर्म का पतन होता है, तो उसे अवतरण होना पडता है] तो क्या अन्य किसी को मोक्ष मिल सकता है?
२)सृष्टि अनादि है तो अविनाशी भी है। वैसे आत्मा भी अनादि और अविनाशि है। तो अविनाशी आत्मा अविनाशि सृष्टि में अविनाशी पात्र बजाना चहिये न!


३)कईयों का कहना है कि आत्मा परमात्मा में लीन होता है। लेकिन आत्मा और परमात्मा को अखण्ड कहा जाता है। अगर आत्मा परमात्मा में लीन होता है तो फिर आत्मा को अविनाशी, अखण्ड कह नहीं सकते। देह प्रकृति मेम लीन होता है। इसलिए उसे विनाशी, असत्य कहा जता है, तो आत्मा को भी असत्य कहना होगा। अगर आत्मा परमात्मा में लीन होता है तो परमात्मा एक और वस्तु मिल जाता है। तो फिर उसे अखण्ड कह नहीं सकते।


४)कईयों का मानना है कि आत्मा ब्रह्मतत्व में लीन होता है। तो भी आत्मा को अविनाशी नहीं कह सकते। क्योंकि लीन होना माना उसका अस्तित्व नष्ट होना। और एक विचार- आत्मा तो चैतन्य है। तत्व तो रहने का स्थान अर्थात जड है। क्या चैतन्य चीज़ जड वस्तु में लीन हो सकेगा?


५)बहुतों का मानना है- पहले स्वयं परमात्मा हमें रचता है, फिर हमें मोक्ष क मार्ग बताता है। अगर यह सच है तो सबसे पहला और सबसे बडा भूल भगवान का ही होता है। क्योंकि यह तो ऐसे हो गया- पहले भगवान खुद हमारे घर में मैला या धूल (जन्म मरण चक्र में) डालकर फिर उसे स्वच्छ बनाने (मोक्ष पाने) पानी और साबून (soap) अर्थात शिक्षा देना।
६)कहा जाता है- भगवान सृष्टि पर धर्म स्थापन करने अवतरित होते हैं। अभी- अगर अच्छे ते अच्छे लोग मोक्ष को पाते हैं तो फिर भगवान धर्म स्थापन किन के लिये करता है?


७)मोक्ष का विचार सभी धर्मों में कोई न कोई रीति में कहा गया है। कईयों का मानना है भगवान में लीन होना, कईयों का मानना है ब्रह्म तत्व में लीन होना, कईयों के अनुसार इस जन्म के बाद सदा काल के स्वर्ग को पाना। सभी का कहना है कि इस दुनिया से मुक्ति पाना। तो फिर ये सभी इस दुनिया में बच्चे क्यों पैदा करते हैं? क्योंकि इस दुनिया में बच्चे पैदा करना अर्थात और एक व्यक्ति/आत्मा को इस दुनिया के बन्धन में डालना हुवा न!
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६)युद्ध का फल (result) कुछ भी नहीं!:-

महाभारत में दिखाया है कि- युद्ध में पाण्डव सेना के सभी मर गये। सिर्फ़ ५ पाण्डव, द्रौपदी, सात्यकि बचे। उनमें भी पाण्डव और द्रौपदी पर्वत पहाड चढते समय एक के बाद एक मरते गये। अभी- सोचने की बात है- अगर उन्होंने धर्म स्थापन किया है तो किसके लिये? अपने लिये है - ऐसे कह नहीं सकते- क्योंकि खुद राज्य छोडकर पर्वत चढते मर गये। साथ में जो भी लडे थे, वे भी मर गये। तो ऐसे कहना पडेगा- जो प्रजा थी- उनके लिये धर्म स्थापन किया। [वास्तव में उनके लिये तो घोर कलियुग ही आया! फ़ायदा उनके लिये भी कुछ भी नहीं हुवा है।]


महाभारत में ऐसे दिखाया है- कि पाण्डव को सिर्फ़ कौरव से दुशमनी थी। कौरव लोग प्रजा को कोई भी हिंसा देने का उदाहरण नहीं दिया है। वहाँ प्रजा को भी कोई प्रकार का बीमारी, अनाज की, पानी की कमी (drought, famine), ऐसे कुछ भी कहा नहीं है। तो फिर उस समय को कैसे धर्मग्लानि का समय कह सकते? अगर सिर्फ़ ५ पाण्डव को अन्याय हुवा तो उसके लिये इतना घोर युद्ध करना उचित है? युद्ध के बाद प्रजा को न तो पाण्डवों की, न कौरवों की पालना मिली। उससे भी बदतर कलियुग आया।
पाण्डवों ने भी विजय प्राप्त करने के बाद राज्य नहीं किया। तो युद्ध का उद्देश, प्राप्ति और अर्थ क्या है?!
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७)दो अति ज़रूरी युद्ध/परिवर्तन:-

अभी हुम सत्य की और चलें। धर्म स्थापन के लिए अर्थात सच्चे सुख, शान्ति के लिए- दो मुख्य परिवर्तन की ज़रूरत हैं। एक अन्दर (मन की अर्थात आत्मा) की और दूसरा बाहर (शरीर और प्रकृति) की शुद्धि। ज़रा सोचिए- अपवित्र वस्तु में शक्ति हो नहीं सकती। जीवन में दुःख के दो कारण हैं- मन की बीमारी अर्थात मनोविकार और तन की बीमारी अर्थात स्थूल बीमारी और गरीबी। तन, मन और प्रकृति- तीनों ही शक्तिहीन बन गये हैं। सम्बन्ध बन्धन बन गये हैं। मनुष्य के तन बीमारी को उत्पन्न करनेवाला है और मन भी विकारों के वश होने के कारण दूसरों को दुख, अशान्ति युक्त बन गया है। इस तरफ़ हरेक स्वयं से और दूसरों से भी दुःखी और परेशान है। यही धर्म ग्लानी का समय है।


लेकिन सतयुग में देह और आत्मा, सम्बन्ध तथा प्रकृति- सभी पवित्र रहते हैं। प्रकृति दासी होकर रहती है अर्थात मानव के हितकारी होकर रहती है। शरीर से भी सुगन्ध निकलता है। उदाः:- श्री लक्ष्मी, श्री नारायण जैसे देवतावोण के शरीर। उन्हें "सर्वगुण संपन्न, १६ कला संपूर्ण, संपूर्ण निर्वेकारि, अहिंसा परमोधर्मि, मर्यादा पुरुषोत्तम"- ये महिमा हैं। यही संपूर्ण धर्म का समय।


इसलिए धर्म स्थापन अर्थात भष्ठ कलियुग को श्रॆष्ठ सतयुग बनाना (बाहर का परिवर्तन), और भ्रष्ठ कलियुगी निवासियों को सतयुग के निवासी होने के लिये योग्य बनाना (अन्दर का अर्थात आत्म परिवर्तन अर्थात असुरी मानव को देव मानव बनाना)।

इसलिए स्थूल विनाश (परिवर्तन) भी धर्मस्थापन के लिये ज़रूरी है। गीताज्ञान आत्मशुद्धि के लिये और स्थूल युद्ध (तथा प्राकृतिक आपदायें) प्रकृति की शुद्धि के लिये हैं। यही गीताज्ञान सुनाने के बाद दिखाया हुवा घोर महाभारत युद्ध का अर्थ है।
परमात्मा जब ज्ञान सुनाता है, तब जिन्हें आसक्ति है, वे उसे सुनेंगे, स्वीकार करेंगे, उसको जिन्दगी में अपनाने का यथाशति प्रयत्न करेंगे। दूसरे जो हैं, वे निरादर करेंगे। ज्ञान को धारण करने के लिये मनोविकार को त्याग करना पडता है। इसमें मानसिक युद्ध (घोर प्रयत्न) करना पडता है। इसे ही गीता में भगवान ने कहा है- "हे अर्जुन- युद्ध कर।"


अन्य दूसरे जिन्हें ज्ञान में आसक्ति नहीं है, वे देहाभिमान के वश होने के कारण आपस में लडेंगे। वे बाहुबल का प्रयोग करेंगे। यह स्थूल युद्ध का कारण बनता है।


गीता में लिखा है, "हॆ अर्जुन, युद्ध कर" न कि "मार, कत्ल कर"। इससे स्पष्ट होता है कि गीता में वर्णित युद्ध अन्दर अर्थात मानसिक है। गीता में बताया है- "काम, क्रॊध, लॊभ, इत्यादि विकार नरक के द्वार हैं। स्वयं का शत्रु और मित्र दोनों स्वयं ही है"- ऐसे कहा गया है। गीता में स्पष्ट बताया है कि "ज्ञान रूपी अस्त्र का प्रयोग कर"। ज्ञान को सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। इन श्लोकों से आप जान सकते हैं। -(३-३७), (३-३८), (३-३९), (३-४०), (३-४१), (४-४२), (५-२३), (६-०५), (१६-२१), (१६-२२), (१८-५१), (१८-५२), (१८-५३) है।
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८)सच्चे शत्रु और अन्दर के युद्ध (धर्मयुद्ध = अहिंसक युद्ध):-

उद्धरेदात्म -(०६- ०५) = "खुदका उद्धार खुदको ही करना है, और स्वयं ही स्वयं को नीच गति की ओर नहीं ले जाना चाहिए। क्योंकि जीवात्मा अपना ही मित्र और शत्रु भी है।" [सोचने की बात है- यहां स्वयं को ही स्वयं के शत्रु माना गया है। किसी अन्य मनुष्य को शत्रु नहीं कहा गया है]

और इन श्लोकों को देखिए- ०६- ०६, ०६-०७, ०३-३७, ०३-३८, ०३-४०, ०३-४१, ०४-४२, ०५-२३, १६-२१, १६-२२, १८-५१, १८-५२, १८-५३ है। इन सभी श्लोकों में मनोविकर ही हमारे निज शत्रु हैं और एक योगी की स्थिति कैसे होनी चाहिए- इनके बारे में समझाया है।

और भी कई श्लोक हैं:- ३-१७, ३-१८, ४-१०, ५-०८, ५-०९, ५-१३, ५-१८, ५-१९, ५-२०, ५-२४, ५-२६, ६-२०, ६-२१, ६-२२, ६-२३, ६-२४, ६-२५, ६-२६, ६-२७, ६-३१, ६-४६, ८-०७, ८-२८, ९-३४, १२-०८, १२-१३, १२-१४, १२-१५, १२-१६, १२-१७, १२-१८, १२-१९, १६-६५, १६-६६ । इनसे सिद्ध होते हैं कि गीता की शिक्षायें स्थूल युद्ध नहीं, बल्कि आन्तरिक युद्ध सिखलाती हैं।
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९)भगवद्गीता- सर्वशास्त्रमई शिरोमणी:-

सबसे श्रेष्ठ पढाई/शिक्षा भगवद्गीता में ही है। उसमें जो शिक्षा दी है- वह धर्मभेद, लिंगभेद, सभी भेदों से मुक्त है। गीता में सभी दुविधावोंसे मुक्त होने की शिक्षा दिया है। सभी मनोविकार सहित देह अभिमान का त्याग करना सिखाती है। वह सर्व में समान भाव रखने के लिए और संपूर्ण अहिंसा सिखाती है। मन को एक छोटे बच्चे से भी ज्यादा शुद्ध बनाने को प्रेरित करता है। इसलिए वह अन्य सभी शास्त्रों से श्रेष्ठ है। लेकिन गीता को "हिंसक युद्ध के लिए प्रेरित किया गया है- ऐसे समझने के कारण गीता खंडन हुवा है।"

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१०)बडे ते बडी भूलें और धर्म ग्लानि:-

१)गीता हिंसात्मक युद्ध को प्रेरित किया, और २)गीता का भगवान निराकारी, सर्वात्मावों के परम प्रिय परम पिता के बदले देहधारी श्रीकृष्ण को मानना- ये दो बहुत बडे भूल हैं। इनके कारण गीता में सिखाया ज्ञान, और योग- दोनों निश्फल हुये हैं। जो ज्ञान वहां बताया है, वह समझ भी नहीं सकते और बुद्धि का योग सर्वश्रेष्ठ परमात्मा से जोडने से जो प्राप्ति हो सकती है, उनसे भी वंचित रह जाते हैं।
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११)क्या सबको भगवान मानना अच्छा या यथार्त है?

क‍इयों का मानना है- "सबको भगवान मानना अर्थात सबको गौरव/सत्कार देना"। इसके बारे में ज़रा सोचे। एक देश के सिंघासन पर राजा को ही बिठाना है अर्थात सिर्फ़ राजा को ही वहां बैठने का हक है। उसके बदले वहां अगर मन्त्री को बिठाया तो भी बडी भूल हो जायेगी। अभी- देश के सारी प्रजा को उस सिंघासन पर बिठाया तो (राजा माना तो) देश का क्या हाल होगा! चलो- आज एक प्रजा को बिठायें, कल दूसरे को, परसों तीसरे को, ऐसे एक एक को एक एक दिन राजा मानते जाये, या सभी को सदा काल के लिए राजा माने- तो सभी का मान बढने के बदले नाम बदनाम ही होगा न।


राजा के सिवाये अन्य किसी को भी सिंघासन पर थोडे समय के लिए बिठाया तो भी सारे देश की इज्जत मिट्टी में मिल जायेगी न! और राज्य कि शक्ति एक दम नीचे आ जायेगा। तो सोचिए- वह स्थान कितना महत्वपूर्ण है! तो भगवान के स्थान पर अन्य किसी को बिठाना कितना अज्ञान, मूर्खता, गलत, निन्दा है!

आज भारत में यह हाल है। धन के लिये भगवान एक, विद्या को दूसरा भगवान; सोमवार का भगवान एक है तो मंगलवार को अलग है। घर में पति को एक भगवान, पत्नि को दूसरा, इस रीति जड चीज़ें- पेड, पौधें, सांप, सभी भगवान बन चुके हैं।
जब भगवान बहुत बन जाते हैं तो क्या एकाग्रता होगी? क्या शक्ति मिलेगी? क्या अनुभूति होगी?
अगर हर प्रजा को राजा मानते चले, तो अगर सचमुच राजा ही हमारे पास आये तो भी हम पहचान नहीं सकेंगे। उसका भी निरादार/अनादर करेंगे। खुद भी अंधकार में रहेंगे, भटकते रहेंगे और दूसरों को भी गलत रास्ता ही बतायेंगे।


इसलिये सबसे ऊंच स्थान राजा (निराकार अशरीरि, अव्यक्त, अभोक्त, परम पिता परमात्मा ) को ही देना चाहिये। बाद/नीचे का स्थान मन्त्रि (देवतावों को - जैसे श्रीकृष्ण, श्रीराम, वगैरह) को देना चाहिए। उसके बाद का स्थान सेनापति (जैसे कि धर्म स्थापक आत्मायें- इब्राहिम, बुद्ध, क्रिस्त, वगैरह) को। तो- इस रीती- जैसा पद, वैसा स्थान हरेक को देना चाहिए न।
सरकारी नौकर को ही सरकार मानना गलत होगा। ऐसे समझने से देश में जितने नौकर हैं उतने सरकार होंगे। नौकर अगर अपने को ही सरकार समझें तो यह कानून को अपने हाथ में लेना हुवा। [अगर सभी नौकर एक ही कानून का पालन करते तो ठीक है। लेकिन एक शिव का भक्त, दूसरा कृष्ण का भक्त, ऐसा हुवा- तो बहुत ही गलत होगा और हुवा है] यही भ्रष्ठाचार का प्रथम द्वार है। आज हम भारत में यह देखते हैं। बहुत जगह "मैं भी भगवान, तुम भी भगवान, शिवोहम", ऐसे मानते आये हैं।


गीता में श्रीकृष्ण का नाम डालने से गीता सिर्फ़ थोडे लोगों (कृष्ण भक्तों) की वस्तु बन गयी। हिंदुवों में भी सिर्फ़ थोडे ही लोग उसे पढने लगे। इससे दूसरे लोग गीता को पढने से भी वंचित हो गये। और जो पढनेवाले हैं उन्हों को भी उससे फ़ायदा न मिला। इस रीति से किसी को भी उपयोग न मिला। भारत शक्तीशाली धर्मशास्त्र से वंचित हुवा।


गीता को न माननेवाले हिंदु लोग अलग अलग अपने ही दूसरे शास्त्र बनाने लगे। इससे नये२ शास्त्र बनते गए और यह भारत को और भी भाग/टुकुडे (divided) करता गया। एकता और शक्ति फिर रहेगी कैसे?! [एक धर्म को एक ही धर्म शास्त्र होना चाहिये। तभी उसमें एकता होगी न। बहुत धर्मशास्त्र होने से अवश्य ही भटकते रहेंगे।]


न केवल इतना ही बल्कि- श्रीकृष्ण को मक्खन चोर, गोपिकावों के वस्त्र चुराये, उनके साथ रासलीला खेला, -ऐसे बहुत गन्दी बात लिखने से श्रीकृष्ण की निन्दा और कलंक लगाया। इससे गीता का मान और भी नीचे आ जाता है। क्योंकि अगर गीता का भगवान ही ऐसा है तो गीता पढनेवालों को क्या शक्ति मिलेगी? इस रीती गीता का हाल ऐसा हुवा - "जैसे बन्दर के हाथ में मोती"
कई कहते हैं- "गीता को किसने कहा- इससे हमारा कोई मतलब नहीं है। हमें इसमें पडने की ज़रूरत नहीं है। गीता में जो बताया है, उसे जीवन में लाना हमारा काम है, बस"। लेकिन गीता में यही मुख्य बात कहा गया है- "मुझे (गीता का भगवान को) निरन्तर, सदा याद कर"। तो गीता को किसने कहा- यह जानना सबसे पहला और अत्यन्त ज़रूरी है न।


तकनीकी या पदार्थों/वस्तुवों (technical or material) के विषय में "किसने कहा" यह मुख्य बात नहीं है। सिर्फ़ "क्या कहा है"- यह काफ़ी है। उदाहरण (example) के लिए- वैज्ञानिक के, स्वास्थ्य के बारे में, कोई यन्त्र के विषय में- किसने कहा- यह मुख्य नहीं है। क्या कहा है- यह काफ़ी है। लेकिन जब आचरण की बात होती है तो किसने कहा - यह बहुत ही मुख्य हो जाता है। उदाहरण के लिये- साधारण मानव कोई आदेश/आज्ञा दिया तो उसे कोइ भी नहीं मानेगा। लेकिन अगर वह राजा का आदेश है तो सभी मनेंगे। क्योंकि राजा के बारे में गौरव, प्यार और डर रहता है। साथ में यह निश्चय भी रहता है कि अगर राजा का आदेश है तो ज़रूर कोई कल्याण के लिये ही होगा और यह भी निश्चय रहता कि राजा का आदेश पालन करने से हमें राजा से अवश्य कोई न कोई प्राप्ति ज़रूर होगी।



वैसे ही अगर गीता में समझाई शिक्षायें अगर निराकार, अशरीरी, अजन्म, अयोनिज, अभोक्त, सर्वात्मावों के परम प्यारे, परमपिता परमात्मा के हैं- ऐसा मानते तो- उस पर लोगों को बहुत गौरव होने की सम्भावना थी। लेकिन गीता का भगवान मक्खन चोर था, वस्त्र चुराये, ......... शरीरधारी है, ऐसे मानने से उसे पढते समय, सुनते समय, सुनाते समय क्या शक्ति, गुण, प्रभुद्धता (maturity) होगी?! नये व्यक्ति सुनते समय उसे विश्वास कैसे बैठेगी? गीता में चरित्र (character) को धारण करने बताया है। जब श्रीकृष्ण के चरित्र को ही इतनी निन्दा किया है तो गीता पढनेवालों को उस श्रेष्ठ चरित्र धारण करने की शक्ति कैसे आयेगी?


जब निराकार सत्य परमात्मा का स्थान देहधारी श्रीकृष्ण को खुल गया (दिया गया), फिर भगवान का स्थान एक के बाद एक-श्री राम, हनुमान, ऐसे ऐसे अन्य सभी को मिलता गया। सभी वह स्थान लेने लगे। आज हर मानव, हर चीज़ भारतवासी को भगवान है। [भारत के सबसे प्राचीन मन्दिर एक शिवजी की ही है। श्रीकृष्ण का मन्दिर उसके बाद आया है। दूसरे देवतावों के मन्दिर उसके बाद आये हैं। इससे सिद्ध है कि सबसे पहले एक शिवजी की ही अव्यभीचरी पूजा होती थी। बाद में भक्ति व्यभीचारि (बहुतों को भगवान मानना) बन गयी।]


प्राचीन ऋषि भी परमात्मा के बारे में "नेति नेति (= न इति)" कहते थे। परमात्मा यह नहीं, यह नहीं (न इति = यह नहीं) है अर्थात परमात्मा को हम नहीं जानते हैं- यह मानते थे। लेकिन बाद में आये हुये अपने को ही भगवान कहने लगे। गीता के श्लोक को ही लीजिये-

न मॆ विदुः सुरगणाः प्रभव० न महर्षयः
अहमादिर्हि दॆवानाम महर्षीणा० च सर्वशः -(१०-२)
"मेरी उत्पत्ति(अवतरण) को न देवता न महर्षी जानते। क्योंकि मैं उन सभी को सर्व प्रकारों से भी आदि हुं।"
आप ही सोचिए:- इस दुनिया में शॆष्ठ माने जाने पूजा योग्य दॆवता हो या ऋषि भी भगवान को नहीं जानते हैं- ऐसे गीता के भगवान ही कह रहे हैं। तो फिर कलियुग के साधारण सन्त, सन्यासी, गुरु लोग जो कलियुग के भ्रष्ठ राजनीति लोगों के कानून के वश हैं, वे भगवान को जान सकते हैं?! इससे सिद्ध है कि जब तक भगवान स्वयं ही धरती पर न आये तब तक कोई भी गुरु, सन्त, सन्यासी भी उसे जान नहीं सकते।


एक नारी को एक ही पति होना चाहिये। अगर सभी को वह अपना पति माने तो? ऐसे ही भक्त को भगवान एक ही होना चाहिये न। अगर सभी को भगवान माने तो भक्त का भी यही हाल होग न! इस रीति से व्यभीचारी भक्ति से भारत का हाल नीचे आ गया।

अगर हम अपने बच्चों की कुछ ज्यादा ही महिमा किया तो उसे कोई भी उसे नहीं मानेंगे, मान नहीं देंगे। लेकिन हमारे बच्चों को ही अगर हम सबके आगे निन्दा की, पत्थर मारे, घर से निकालें, तो अन्य भी उन्हें गाली देंगे, पत्थर मारेंगे। वैसे ही अगर हम "श्रीकृष्ण को भगवान है, उसने छोटेपन में ही ऐसे२ चमत्कार किया"- ऐसे कहे तो कोई भी उसे नहीं मानेगा। लेकिन हम श्रीकृष्ण को मक्खन चोर, ...... ऐसे२ निन्दा की तो अन्य भी श्रीकृष्ण का ऐसे मजाक करेंगे। इसलिए जिसकी जितनी महिमा है उतना ही करनी है। नहीं तो नष्ट होगा।


अगर भारतवासी एक ही निराकार शिव को भगवान मानते, वही अल्लाह, गाड, जेहोवा है- ऐसे समझते या जानते थे, तो अन्य धर्मवाले कोई भी शिव के मन्दिर को नहीं लूटते थे। अगर सर्व के सद्गतिदाता एक ही निराकार भगवान है, यह समझते थे, तो सभी उसका आदर करते थे। भारत देश सारी दुनिया का सबसे बडा तीर्थ स्थान होता था। गीता में कृष्ण का नाम डालने से, युद्ध को हिंसक समझने से, गन्दी कथायें लिखने से- यह बुरा हाल हुवा है। क्योंकि शरीरधारी को सभी भगवान थोडे ही मानेंगे! गीता में कृष्ण का नाम डालना धर्म पतन का पहला और सबसे मुख्य कदम है।


इसलिए जब तक भारतवासी एक सत्य भगवान को नहीं पहचानेंगे, तब तक भारत फिर से अपनी श्रेष्ठ स्थिति पा नहीं सकता।
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१२)पहला गलत रास्ता का बीज/कारण है देहाभिमान:-

गीता में बताया सार है- "हम देह नहीं, अविनाशि चैतन्य आत्मा हैं। देह, देह के संबंध, पदार्थ, देह के सभी धर्मों से जो मोह है, उसे त्याग कर एक अशरीरि, अव्यक्त, अजन्म, परम ज्योति स्वरूप परमात्मा के ध्यान/याद में रहना"
लेकिन जब परमात्मा के स्थान पर देहधारि श्रीकृष्ण को डाला गया तो सत्य, पवित्र, श्रेष्ठ आत्मिक प्यार देह के प्यार में बदल गया। यह बहुत बडा नुकसान हुवा। अपने को देह समझा- यह भी यहाँ एक कारण है। भले ही- "सभी शास्त्र कहते हैं कि "हम आत्मा हैं, शरीर नहीं"; लेकिन कर्म करते समय हम अपने को देह ही मानकर कर्म करते हैं। अन्दर की मनोस्थिति में भी अपने को देह समझते हैं। इस (अपने को शरीर समझने के) कारण हमें अशरीरि भगवान की अनुभूति नहीं हो पाती। यह ऐसे है कि- जैसे अगर भारत से प्यार होना चाहिये तो अपने को भारतवासी समझना पडेगा न। माँ से प्यार होना चाहिये तो उस माँ का बच्चा मैं हूँ - ऐसे मन में लाना पडेगा न य उस माँ का बच्चा होने के लिये तैयार रहना पडेगा न। इसी तरह- परमात्मा से अगर प्यार करना है तो अपने को देह से अलग आत्मा मानना होगा (क्योंकि भगवान को शरीर नहीं और वास्तव में आत्मा भी शरीर से अलग ही हैं।)। नहीं तो कितना भी "शिव, शिव" जप करते रहे तो भी भगवान की अनुभूति हो नहीं सकता।


अपने को देह समझने से, देहधारियों में सर्वश्रेष्ठ जो श्रीकृष्ण है उसे भगवान के स्थान पर बिठाया गया। इस कारण सच्चे आत्मिक प्यार दैहिक प्यार में बदल गया। यही कारण है कि श्रीकृष्ण को १६१०८ राणियाँ थी- ऐसे कहा गया।
वास्तव में हरेक मानव परमात्मा की आशुक है और परमात्मा माशुक है। लेकिन सारे मानवकोटि में सिर्फ़ १६१०८ ही परमात्मा को सबसे ज्यादा प्यार से याद करेंगे। देहाभिमान के कारण अपने को भी देह समझ देहधारि श्रीकृष्ण को ही परमात्मा समझ सत्य आत्मिक प्यार शास्त्रों में अपवित्र, दैहिक प्यार रूप से वर्णन हुवा। इस रीति से भगवान की, श्रीकृष्ण की और सारे भारत की निन्दा हुई। अहिंसक युद्ध भी हिंसक रूप लिया। इनसे आँख (गीता ज्ञान) होते भी हम अंधे बन गये। इसके कारण कोई भी गीता को समझ न सके।
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१३)मोह- सभी दुष्ट, बुरे और दुर्गतियों के द्वार है:-

गीता सभी मोह त्याग करने को कहता है। देह अभिमान के कारण भी देह के साथ का मोह ही है।
हरेक के शत्रु स्वयं के देह में मोह और उसके भाई/संबंधियों में जो मोह है वही कारण हैं। इन दो मोह के कारण ही मनुष्य पाप करता है और बंधन के वशी भूत होता है। और मोह के वश होने कारण अन्य इच्छायें, बंधन भी उसे बांध लेती हैं और दुर्बल बना देते हैं। समाज में जब मोह बढता है, तब लोग दॆश के बारे में सोचने के बजाय अपने लौकिक परिवार/संबंधियों के बारे में ही सोचते रहते हैं। तब देशभक्ति कम होता है। जब मनुष्य अपने परिवार में ही आसक्त होते हैं, तो दुष्ट व्यक्तियों को पाप करने सहज होता है। मोह हमारे विवेक, महसूस करने की शक्ति, आत्म सम्मान को नष्ट करता है। दूसरों से हम जल्दी प्रभावित होने लगते हैं। हमारी चलन भी दूसरों के ऊपर नकारात्मक प्रभाव होने योग्य होते हैं। समाज में व्यर्थ, अनारोग्य स्पर्धा (wrong competition) शुरु होता है। इससे हरेक प्रजा एक दूसरे के मित्र बनने के बजाय शत्रु बनता जाता है।


लोग अपने जिम्मेवारी भूल जाते हैं। सरकार को tax देने में धोखा करते हैं। इससे सरकार भी अपने काम के लिये दुष्ट नीति अपनाती है। वह सिगरेट, मद्य, गांजा, वैगरह बेचती रहती है। कई अलग अलग tax प्रजा के ऊपर डालती रहती है। इन दुष्ट कार्यों से ही सरकार और प्रजा का पालन होता रहता है। लोग प्रकृति का प्रदूषण/मलिन करते हैं।

[हमरे पहला मातापिता भगवान (सच्चे गुण और चारित्र्य) है। दूसरा स्थान प्रकृति का है जो हमें जिन्दगी (तन्दुरुस्ती) देती है। तीसरा स्थान सरकर का है जो समाज में कानून की सुव्यवस्था रखती है। चौथा स्थान है हमारे मातापिता जिन्होंने हमें पैदा किया। क्योंकि उन्होंने हमें जो कुछ भी दिया वह इन्हीं तीनों से लेकर ही दिया है। और उन्होंने हमें पैदा कर हमें कर्म बन्धन में भी डाला है न।]


मोह ज्यादा होने से देश दूसरों के आक्रमण/चढायी को सामना करने की शक्ति कम होती जाती है। उदाः:- विदेशी लोग कम थे। फिर भी भारत पर कब्जा कर ली। क्योंकि भारतवासी मोह के पन्जे में फसे हुये थे। वे अपने स्वार्थ के लिये देश को ही बलि देकर फिर खुद्को भी उसका फल भोगना पडा। "जीने के लिये खा"- यह है जीने की विधि। लेकिन मोह "खाने के लिये जी"- ऐसे बना देती है।

मोह से मानसिक तनाव ज्यादा होने से शारीरिक बीमीरी भी ज्यादा होने लगते हैं। विज्ञान भी कहता है- स्थूल बीमारी के ७०% कारण भी मानसिक ही हैं। भ्रष्ठाचार के कारण भी मोह ही है। लोग अपने स्वार्थ और बन्धनों के वश होकर रिश्वत देने के लिए भी तैयार होते हैं।

पृथ्वि/भूमि के आकर्षण बल (gravitational force of attraction of earth) के प्रभाव से मुक्त होने से ही विमान (aeroplane) उड सकता है। विमान का सफ़र अन्य सभी सफ़र से विशेष और आनन्द मय है। वैसे ही सभी इन्द्रिय सुखों से श्रेष्ठ आत्मानन्द, परमानन्द, ब्रह्मानन्द या अतीन्द्रिय सुख को प्राप्त करने के लिये देह, देह के सम्बन्धी, देह के पदार्थोम के मोह के बल/बन्धन से मुक्त होना चाहिए। यही गीता का सार है।


इसलिए- ये दो मोह ही हरेक के मानसिक आनन्द, शारीरिक स्वास्थ्य, सारे देश तथा विश्व के हित के लिये (सभी- आध्यात्मिक, राजकीय, सामाजिक और आर्थिक द्रुष्टिकोणों से) बडे ते बडे शत्रु हैं। इसलिए गीता सिर्फ़ एक धर्म के या देश के लिये शास्त्र नहीं। वह सारे विश्व को आध्यात्मिक, राजकीय, सामाजिक और आर्थिक (spiritual, political, social, economical) रूपों से शक्तिशाली बनाने का शास्त्र है।


मोह के बिना अगर कोई काम गलत भी हो, तो भी सकारात्मक फल देगा। जैसे बच्चे कुछ भी करे, सुख भासता है। क्योंकि वह दूसरों के मन को सकारात्मक परिवर्तन करने में मदद करता है। तो भविष्य के लिए उसमें अच्छा फल तो निश्चित है। न केवल इतना ही- बल्कि अगर कुछ गलत भी हो, तो भी उसे ठीक करने में ज्यादा मुश्किलात नहीं होगी। क्योंकि जहां मोह नहीं है, वहाँ सरलता, (simplicity, flexibility) वगैरह गुण सहज ही तैयार रहेंगे। इसलिए ही गीता में कहा गया है कि- "जिसमें मोह नहीं है उसे कर्म बन्धन नहीं है। उसे कोई भी काम करने की ज़रूरत नहीं। वह कोई भी काम करने पर उसे दोष नहीं लगेगा"।]

[वैसे ही अगर मोह के वश होकर अच्छा काम भी करे, तो भी फल कम या अल्प काल का हो जाता है। क्योंकि वे कर्म के वा कर्म के फल के वश होकर कर्म करते हैं। इसलिए इसमें अपवित्रता और बन्धन साथ होते हैं। जो उनसे सेवा लेते हैं, उन्हें भी बन्धन का अनुभव होता है और अन्दर की जो खुशी और शक्ति मिलनी चाहिये, वह मिलती नहीं। स्वमान धारण होने के बजाय स्वार्थ, कमज़ोरीपन धारण होने की सम्भावना ज्यादा है।


बल्कि- जो मोह के वश हैं, वे ज्यादा से ज्यादा सिर्फ़ अपने संबंधियों का ही कल्याण चाहते हैं। अपने लोगों का कल्याण करते समय दूसरों को क्या अन्याय होता है- इसके बारे में वे नहीं सोचते। अगर कोई समझाता तो भी समझने की शक्ति नहीं होगी। अगर समझ में आया तो पालन करने को मन नहीं होगी।]

हरेक प्राणी में एक विशेष शक्ति होती है। जैसे कुत्ते को वासना ग्रहण करने की शक्ति, ...। वैसे मनुष्य की सबसे बडी शक्ति है बुद्धिशक्ति। अगर वह प्रणी अपने शक्ति का उपयोग नहीं किया तो उसका जीवन व्यर्थ वा साधारण बन जाता है। मोह हमारे बुद्धि को ही नष्ट करती है। तो सोचिए- मोह से कितना भारी नुकसान होता है हमारा कितना बडा दुश्मन है!
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१४)इसलिए- भाई/संबंधी ही शत्रु हैं:-

इसके बारे में ऊपर बताया गया है। यहाँ थोडा विस्तार से समझेंगे। अपने मित्र संबंधी से मोह तोडना (उनके साथ व्यवहार करते, रहते भी) इतना सहज नहीं। यह तो जैसे कि सभी संबंध और हर वस्तु से निमित्त मात्र (trustee) व्यवहार करना। यह जैसे कमल का फूल पानी में रहते पानी से ऊपर रहता है। साधु, सन्यासियों के लिए तो इतना कठिण नहीं है क्योंकि वे घर बार छोड जंगल में चले जाते हैं या अलग रहकर साधना करते हैं। लेकिन लौकिक में रहकर अपने शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करते भी मोह से परे होना बहुत ही challenging है। साथ रहकर मोह तोडने में संबंध बडा विघ्न रूप बनते हैं।


भाई ही शत्रु हैं- इसका दूसरा अर्थ:- दुनिया के सभी एक भगवान के बच्चे हैं। लेकिन कलियुग के अन्त में हरेक भी पतित होने कारण जैसे कि रोग फ़ैलानेवाले महारोगी हैं। हरेक में या तो स्वार्थता, विकार भरा है या तो कमज़ोर है। हरेक का संग हमें या तो दुःख देता है या तो बोझ बनता है। स्वस्थ कोई भी नहीं है। सभी माँगनेवाले हैं। सभी के मन भटकनेवाला है।

आध्यात्मिक साधना करनेवाले भी आपस में शत्रु ही हैं! (अर्थात यहाँ भी मोह को जगह नहीं है।) क्योंकि सभी साधक अपूर्ण ही हैं। वे भी तो नाव में बैठे हुये हैं न कि मंजिल है। करेक को अपना नाव खुद ही चलाना है। आध्यात्मिक जीवन तो जैसे विद्यार्थी जीवन है। हरेक को अपनी परीक्षा खुद ही लिखना है।

प्रकृति भी हमारा शत्रु ही है। प्रकृति मलिन, शक्तिहीन बन चुकी है। आपदायें भी लाती रहती है। इसलिए मेरा प्रथम शत्रु मैं खुद ही हूँ। दूसरे अन्य लोग तथा प्रकृति है। इसलिए ही गीता में सभी से वैराग होने के लिये बताया है।
लेकिन हमारे शत्रु हमारे मित्र भी है!:- इसी पतित बीमारी फ़ैलानेवाला शरीर में रहते ही मुझे आध्यात्मिक साधना करनी है। इस समाज में रहकर ही मुझे साधना करनी है। शरीर निर्वाह अर्थ कमाई करने के लिए मुझे अन्य लोगों का सहयोग भी अवश्य ही है। प्रकृति अब भी मुझे खाना खिला रही है न। तो यहाँ न्यारापन और प्यारापन- दोनों साथ२ चाहिए। जितना प्यारापन है उससे न्यारापन थोडा ज्यादा ही होना अवश्यक है था कि कभी भी न फ़से।

और एक बात:- हरेक को अपने घर में सबसे ज्यादा स्वतंत्रता होती है। इसलिए घर उसकी सबसे मुख्य ज़रूरी है। इस दृष्टि में घर हरेक का मित्र है। लेकिन हरेक अपने घर में ही आलस्य, अलबेलापन के वश होकर नकारात्मक और व्यर्थ कर्म करता है। इस दृष्टि में घर ही उसका सबसे बडा शत्रु है।

(घर में) मोह के वातावरण होने के कारण ही आध्यात्मिक साधना के लिए दूसरे जगह की ज़रूरत होती है। लेकिन दूसरे स्थानों में स्वतंत्रता या अधिकार कम रहता है। इसलिए जिसको जिन्दगी में परम श्रेष्ठ अनुभूति मंजिल है- उसे अपने घर में रहते ही/भी घर से मोह तोडना होगा। तब वह घर मन्दिर समान बनेगा।

सार:- मोह के वश होने से अच्छे बातें भी बुरा फलदायक (नीचे ले जाते) होते हैं। मोह को त्याग करने से बुरी बातें भी उन्नती की तरह ले जाती हैं। इसलिए ही गीता में सर्व से, सर्व बातों से, सर्व परिस्थितियों से समभाव होने की शिक्षा दी है।

लेकिन भगवान सदा हमारे सच्चे दोस्त हैं और विकार सदा हमारे दुशमन हैं। तो भगवान से सदा दोस्तीपन रखना और विकारों से सदा किनारा रखना चाहिए। अगर इन दो बातों में ठीक रहे तो दूसरों से हम कैसे भी व्यवहार करे- तो चलेगा। कोई गलती नहीं होगी। इसलिए गीता में कहा गया है- "गाय, कुत्ता, माँस खानेवाला, ब्राह्मण- इन चारों को भी समान भाव से देखनेवाला ही ज्ञानी है"।

मोह अर्थात जिससे मेरा वास्तविक संबंध नहीं है, उसमें आसक्त होना। यह मिलावट (mixture) है। इससे खुद का मूल्य नीचे गिरता है। आत्मा अविनाशी है। शरीर और पदार्थ विनाशी हैं। इसलिए जब भी मैं (आत्मा) विनाशी शरीर और चीज़ों में आसक्त होता हूँ, तो समझना चाहिए कि मैं अपने को नीचे ले जा रहा हूँ, खुद की हत्या कर रहा/रही हूँ; यही आत्मघाती अर्थात महापाप है।
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१५)धर्म, अधर्म, स्वधर्म, सद्धर्म, परधर्म के अर्थ:-

धर्म:- धर्म अर्थात धारणा। अर्थात जीवन में जो मर्यादायें पालन करने हैं, वे। इसलिए कहते हैं- अभी तक मैं ने जीवन में जो गुण/चरित्र अपनाये हैं वे मेरे जीवन के धर्म (मूल्य) हैं।

तो जब हम साधारण रूप से धर्म शब्द का उपयोग करते हैं, तो वह पूर्ण स्वास्थ्य का अर्थ लेता है तो "इसका धर्म" जब कहते हैं तो वह उस व्यक्ति की तन्दुरुस्ती का अर्थ लेता है। वैसे ही जब हम एक समूह, संघटन (group) का धर्म कहते हैं तो वह उस संघटन का average मूल्य का अर्थ दिलाता है।

धर्म का दूसरा अर्थ है सहज गुण, स्वभाव। उदाः (for example) आग का धर्म है जलाना, पानी का धर्म है भिगाना, शक्कर का गुन है मीठापन,...।

समाज में अनेक संघटन हैं। जैसे- हिंदु, इस्लाम, इसाई, सिक्ख,.. वगैरह। हर संघटन दावा (announcement) करता है कि हमारा संघटन की धारणा इस इस प्रकार हैं। इसलिए एक एक संघटन को अलग अलग धर्म के नाम हैं। हर संघटन अपनी२ धारणा के बारे में अपनी ही ग्रंथ तैयार की है। इसलिए उस ग्रंथ को अपने अप्ने धर्म के धर्म‍शास्त्र कहा जाता है।

स्वधर्म:- स्वधर्म अर्थात स्व के धर्म अर्थात आत्मा के निज गुण। आत्मा की निज गुण है शान्ति। इसलिए ही शान्ति सभी के सबसे प्रिय और ज़रूरी वस्तु है। कोई कितना भी बडा त्यागी हो, कह सकता है- मुझे पैसे नहीं चाहिए, सुख नहीं चाहिए, भोजन नहीं चाहिए,...। लेकिन कोई भी यह कह नहीं सकेगा कि मुझे शान्ति नहीं चाहिए। क्योंकि शान्ति आत्मा का स्वधर्म है।

सद्धर्म:- अर्थात सत+धर्म। अर्थात सबसे श्रेष्ठ धर्म। इसका नाम है आदि सनातन देवी देवता धर्म। यह धर्म सतयुग और त्रेतायुगों में रहता है। जब यह धर्म रहता है, तो दुनिया में धर्म (मूल्य, चरित्र) पूर्ण रूप/मात्रा में रहता है। उस समय मन, वचन और कर्म- तीनों में समानता होती हैं। मनुष्य जो सोचता है, वही बोलता है और करता है। [लेकिन आज- सोचना एक, बोलाना दूसरा, करना तीसरा- इसको ही अधर्म कहा जाता है]


परधर्म:- पर अर्थात जो स्व(आत्मा) से परे(अलग) है। अर्थात देह और देह के संबंध और पदार्थें। शरीर होने के कारण हमें शरीर निर्वाह अर्थ कर्म करना पडता है। उदाः:- भोजन, निद्रा, स्नान, कमाई, वगैरह। वैसे ही अपनी रचना (बच्चों) की पालना या समाज में जो सम्बंध निभाना हैं वे। ये सभी स्थूल कर्मों को निभाना ही परधर्म हैं।

अधर्म:- अर्थात जो धर्म के विपरीत/विरुद्ध हैं। जिसे पाप/विकर्म भी कहा जा सकता है। काम, क्रोध, इत्यादि वगैरह, विकार के वशीभूत होकर करनेवाले कर्म।


स्वधर्म को भूलने से परधर्म भी धीरे धीरे अधर्म की ओर जाता (बन) है। स्वधर्म अर्थात ज़मीन में रहना। परधर्म अर्थात पानी में पैर रखना (कर्म करना)। अधर्म अर्थात पानी में डूब जाना (कर्म के वश होना)। इसलिए कर्म करते समय स्वधर्म (सहारा= किनारा) को भूलना नहीं चाहिए।

श्रेयान स्वधर्मो विगुणः। परधर्मत स्वनुष्थितात ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः। परधर्मो भयवहः। -(०३-३५)
"स्वधर्म का अपूर्ण पालन भी परधर्म की पूरी पालना से श्रेष्ठ है। स्वधर्म का पालन करते समय मृत्यु भी शुभ/उत्तम है। लेकिन परधर्म भय/हानि उत्पन्न करनेवाला है।"


स्वधर्म अर्थात शान्ति अर्थात चरित्र (character)। है। परधर्म अर्थात देह और देह के मित्र संबंधीयों से रिश्ता निभाना, अपने शारीर को शुद्ध तथा स्वस्थ रखना। शरीर निर्वाह अर्थ कमाई करना, दफ़्तर में अपना काम कज़ ठीक तरह से करना, -ये सभी हैं। परधर्म का अर्थ है पर(दूसरों) को मेरे से तकलीफ़ न पहुंचे- इसका ध्यान रखना। तो परधर्म अनुशासन (discipline) के बराबर है। गीता का श्लोक कहता है कि- स्वधर्म अर्थात आध्यात्मिकता (= character) का थोडा पालन करना भी परधर्म (discipline) की पूरी पालना से श्रेष्ठ है।


तो इसका अर्थ यह है कि चरित्र का पालन थोडा सा करना भी बाकी सब कर्तव्यों को निभाने से श्रेष्ठ है। स्वधर्म में म्रुत्यु भी उत्तम ही है। क्योंकि सवधर्म अर्थात आत्मा और परमात्मा की चिन्तन में रहना। कर्मयोगी होकर कर्म करना। तो भगवान की याद में शरीर छोडना भी अच्छा ही है। यह भी गीता मेम कहा गया है। क्योंकि उससे अच्छी गति प्राप्त होगी। नीचे देखिये। [लेकिन परधर्म भय या हानि को उत्पन्न करनेवाला है। क्योंकि वह हमारी बुद्धि को भटकाता भी है। क्योंकि बुद्धि देह, देह के सम्बन्धी, पदार्थों में लगाना पडता है। देह तो विनाशी है, उसके बारे में कोई निश्चय नहीं है। देह के बारे में ज्यादा सोचने से तो भय, तंग ही होंगे न।]

कविं पुराणमनु ..." -(०८-०९, ०८-१०)
"मृत्यु के समय जो अचल श्रद्धा से, मन से भी, योगबल से भी अपने प्राण (= बुद्धि) को भ्रूमध्य(आत्मा के स्थान) में अच्छी तरह से स्थित करके परमात्मा को याद करता है, वह उस परमात्मा को पाता है।"

इसमें दूसरा अर्थ भी है- अर्थात स्वधर्म का थोडा पालन (थोडी सी भी आत्मानुभूति से और परमात्मा की सच्ची याद से जो सुख मिलता है), अन्य सभी सुखों (चाहे तन्दुरुस्ती की, पैसे की या इन्द्रिय सुख, या संबंधियों से) से श्रेष्ठ है। क्योंकि स्वधर्म का पालन हीरे (ज्ञान रत्न) का धंधा है तो परधर्म का धन्धा तो चने मुट्ठी का धन्धा है। क्योंकि स्वधर्म में साधक परमात्मा से ही सर्व संबंधों का रस पाता है। वह परमात्मा को सर्व संबंधों से याद/प्यार करता है (त्वमेव माताश्च पिता त्वमेव...)


लेकिन इसका गुह्य रहस्य न जानने के कारण गीता लोगों ने ऐसा समझा है कि - "भगवान से वर्णों को बनाया"- इससे हिन्दु धर्म और भी टुकुडे टुकडे हो गये। स्वयं हिन्दु ही अन्य वर्णॊं को सच्चा गौरव दे नहीं पा रहे हैं। यह अनर्थ तीसरी बडी भूल है जिसके कारण सभी हिन्दु सिर झुकना पड रहा है- क्योंकि भगवान ने ही वर्ण भेद किया है- ऐसे मानना तो यही होगा न।
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१६)श्लोक १८-६६ और ४-०८ के रहस्य:-

गीता में "सभी धर्मों को छोडो (१८-६६)"- ऐसे एक जगह कहा गया है तो, दूसरी जगह बताया गया है कि "मैं धर्म स्थापन करने आता हूँ (०४-०८)"। तो कौन कौन से धर्म छोडना है और भगवान कौन सा धर्म स्थापन करता है?
उत्तर:- देह के सभी धर्म(उदाः:- हिन्दु, मुसल्मान, सिक्ख, इसाई, वगैरह) त्याग करने भगवान ने कहा है। और परधर्म के अभिमान से भी मुक्त होना है। परमात्मा सद्धर्म (आदि सनातन देवी देवता धर्म) स्थापन करता है।

परमात्मा सभी धर्मों को त्याग करने क्यों कहा है? क्योंकि वे सभी आज पुराना अर्थात पतित अर्थात धर्मभ्रष्ठ बने हैं। इसलिये आपस में लड रहे हैं। भगवान के नाम पर गलत रास्ता अपना रहे हैं। जैसे जब घर पुराना होता है, तो उसे छोड नये घर में जाते हैं, वैसे ही अब इस पुराने धर्मों छोड सद्धर्म में जाने का समय है।
इन श्लोकों से यह भी सिद्ध होता है कि गीता का समय द्वापर युग नहीं, बल्कि कलियुग हैं, क्योंकि द्वापुर में तो अनेक धर्म थे ही नहीं। इन श्लोकों से साफ़ होता है कि परमात्मा के अवतर्ण के समय अनेक धर्म होने चाहिये। आज अनेक धर्म हैं। हर धर्म में छोटे२ और और वर्ण, मठ, पन्थ (caste, subcastes) हैं। जो सनातन धर्म था वह आज नहीं है।
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17)"विनाशकाले विपरीत बुद्धि विनश्यन्ति, निश्चय बुद्धि विजयन्ति"-

ऐसे कहा जाता है। यहां विनाशकाल क्यों कहा गया है? इससे सिद्ध है कि परमात्मा सृष्टि के विनाशकाल में ही अवतरित होते हैं। अर्थात कल्प के अन्त के समय में अवतरित होता है। इसलिये गीता का समय कलियुग के अन्त ही हो सकता है न कि द्वापरयुग।

महाकालेश्वर- यह नाम ईश्वर के लिए ही कहा जाता है न कि श्रीकृष्ण को। यहाँ भी विनाश काल कहा गया है और गीता के बाद महाभारत युद्ध के घोर विनाश दिखाया है। क्या इससे भी नहीं लगता कि गीताज्ञानदाता ईश्वर ही हो सकता है?

ज्ञान को तेसरा नेत्र कहा गया है। सिर्फ़ शिव को ही त्रिनेत्रि नाम है। तो ज्ञान का तीसरा नेत्र शिव के पास ही हो सकता है न! गीता तो सबसे श्रेष्ठ ज्ञान है और गीता में दिव्यदृष्टि (यह भी तीसरा नेत्र का ही अर्थ है) नाम भी है। तो क्या इससे भी गीता ज्ञानदाता शिव ही हो सकता है न!

ज्ञान यज्ञ, रुद्र यज्ञ कहा जाता है है। कृष्णयज्ञ ऐसे कहीं भी नहीं कहा है। इससे भी सत्य सत्य ज्ञान शिव के पास ही हो सकता है- ऐसे लगता है न!
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18)वास्तविकता की दृष्टि से देखा तो भी गीता ने हिंस्क (बाहुबल, स्थूल) युद्ध को प्रेरित नहीं किया है!-

गीता स्थूल युद्ध को प्रेरित किया- भले ही भारतवासी ऐसे मानते आये- फिर भी गीता भारतवासियों को अभी तक हिंसा के लिए प्रेरित नहीं किया है। भारतवासियों ने अन्य सभी धर्मों को सम्मन, गौरव, स्थान, आश्रय दिया है। भारत ने कभी भी अन्य कोई देश के ऊपर आक्रमण/चढाई नहीं की है। इससे भी सिद्ध होता है कि भगवद्गीता ने न स्थूल युद्ध को प्रेरित नहीं किया है और न ही गीता में सिखाया शिक्षा स्थूल युद्ध को प्रेरित करनेवाली है।

लेकिन आज अन्य धर्म और कई देश भारतवासियों का निरादार कर रहे हैं। पीडा दे रहे हैं। देवतावों के चित्रों की निन्दा भी कर रहे हैं।* तो इस समय कई लोग भारतवासियों को स्थूल रूप से जागृत करने के लिये भी गीता का इस्तेमाल थोडे हद तक करने लगे हैं। लेकिन इसमें उनके कोई दोष नहीं है। क्योंकि दूसरों के दुर व्यवहार, हिंसा ही इसका मुख्य कारण है।

इसलिये निकट भविष्य में महाभारत युद्ध (तीसरे विश्व युद्ध) जब लगेगा, तब लोगों को "महाविनाश हो रहा है, तो ज़रूर भगवान भी कहीं न कहीं होगा"- यह समझना या महसूस होना सहज होगा (क्योंकि गीता को हिंसक युद्ध से जोडा है न)। तो हमारे अन्दाज में ऐसे लगता है कि सृष्टिनाटक के रहस्यों में से यह भी एक हो सकता है।

भले ही- हिंदु लोग अनेक देवताओं को पूजते हैं, फिर भी आध्यात्मिकता के श्रेष्ठ रुचि आज भी हिंदुवों मे ही है। भले ही हिंदु शास्त्रों में गन्दी बातें हैं (उदाः:- द्रौपदि को ५ पति थे, .....), फिर भी अत्यन्त उच्छ विचार भी हिंदु धर्म में ही हैं। अच्छा चाहनेवाला सिर्फ़ उत्तम बातें को ही शास्त्रों से उठा सकता है। (जैसे हंस पानी से दूध को अलग करती है, वैसे)।

* - यहाँ एक बात बताना भी ज़रूरि है कि देवतावों कि निन्दा आज अन्य धर्मवालोम ने कितना किया है, उससे कहीं ज्यादा भारतवसियों ने ही किया है। ओरिस्सा के पुरि जगन्नातेश्वर के मन्दिर, तथा और भी बहुत मन्दिरों में देवतावों के गन्दे चित्र लगाया है। और शास्त्रों में देवतावों के बारे में भी बहुत ही गन्दे विचार लिखी हैं। इस दृष्टि से भारतवासियों से अपने ऊपर आपे ही कुल्हडा मारा है। ऐसे कहना गलत नहीं होगा।
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